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Tuesday, February 14, 2012

शरद यादव ऑन मिडिया !!!!!


मिडिया की दुकानदारी से एन.डी.ए. कॉन्वेनर और जे.डी.यू. के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव काफी खफा है। शरद यादव कहते हैं कि चुनावी प्रक्रिया में सुधार करके लोकतंत्र को मजबूत करना है तो सिर्फ राजनीतिक सुधार से कुछ नहीं होगा मिडिया में बड़े तौर पर सुधार की जरूरत है। मिडिया में बढ़ती दलाली, ठेकेदारी, चाटुकारिता और चापलूसी संस्कृति से शरद यादव नाराज है। इनदिनों शरद खुलकर मिडिया से जुड़े मसलों पर बोल रहे हैं। लखनऊ में 14 फरवरी को उन्होंने मिडिया पर अपनी बात कुछ इस तरह से रखी जो मिडिया से किसी भी रूप में ताल्लुकात रखने वाले लोगों को जानना और सुनना चाहिये।

बिहार के सियासी दल बनेंगे उत्तर प्रदेश में वोटकटवा !!!



बात मकर संक्रांति के दिन की है। बी.जे.पी. के एक नेता के घर दही- चुड़ा खाने का कार्यक्रम था। कमोबेश इन्हीं दिनों जे.डी.यू. उत्तर प्रदेश का चुनावी जंग बी.जे.पी. से अलग होकर लड़ने का मन बना चुकी थी। बातचीत के दौर में ही जनाब बिहार एन.डी.ए. के सिरमौर कहे जाने वाले नेताजी कह बैठे कि - जिन्हें हम अपनी पार्टी से टिकट नहीं देगें उसे अपने सहयोगी से दिलवा देंगे। अब बात हलके में या मजाक में कही गयी भले हो लेकिन इसकी हकीकत से इन्कार भले ही किया जा सके। बिहार की राजनीति को नजदीक से देखने वाले लोग भी जानते हैं कि किस तरह लालू यादव ने कालांतर में कांग्रेस को पूरी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिये मनाकर वोटकटवा बना दिया और सत्ता में पुनर्वापसी भी की। इस प्रॉक्सी पॉलिटिक्स के तकाजे से देश की राजनीतिक समझ रखने वाले लोग बखूबी दो- चार हैं। राजनीति में चुनावी समझौता करना और सहयोगी बनना आमबात है। लेकिन बैकडोर से अंदरूनी समझौते के तहत उम्मीदवारों को खड़ा कर वोट काटना और अपने सहयोगी को जितने में मदद करना भी वर्त्तमान राजनीति का तकाजा बन चुका है। अगर इस पूरे संदर्भ को संज्ञान में लें तो सवाल उठता है कि लालू यादव तो कांग्रेस के पक्ष में सरेन्डर बोल चुके हैं ! पर क्या उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस के लिये एल.जे.पी. और बी.जे.पी. के लिये जे.डी.यू. इसी वोटकटवा की भूमिका में है?

उत्तर प्रदेश के चुनाव में बिहार की तीन प्रमुख सियासी पार्टियाँ भी अपना दम ठोक रही हैं और राजनीति का विस्तार करने में जुटी हैं। बी.जे.पी. से अलग उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी जनता दल यूनाईटेड ने 403 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर दिया है जिससे जाहिर है कि 2014 के राष्ट्रीय परिदृश्य में अपना दबदबा कायम करना चाहती है। वहीं मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल सेक्यूलर मतों का बिखराव रोकने के लिये ज्यादा सीटों पर लड़ने के मूड में नहीं है और लालू यादव की पूरी रणनीति कांग्रेस हाईकमान व युवराज को खुश करने की है। तो लोक जनशक्ति पार्टी दफ्तर ढ़ूढ़ने पर भले ही मिल जाये पर नेता ढ़ूढ़ना बहुत मुश्किल है लेकिन रामविलास पासवान 403 सीटों पर लड़ने का मन बना चुके है। इस पूरे परिदृश्य में साफ है कि इन दलों से ज्यादा इनके नेताओं का वजूद उत्तर प्रदेश के चुनाव पर अँटका हुआ है। चुनाव परिणाम से न सिर्फ इन दलों का जमीनी धरातल पर मजबूती साबित होगी, लालू- रामविलास - नीतीश कुमार की बिहार के बाहर असर भी साबित होगा।

बिहार में जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की मिली जुली सरकार चल रही है। बिहार में जे.डी.यू. - बी.जे.पी. पिछले कई सालों से साथ चुनाव लड़ा करते है और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का अहम हिस्सा है। इस एन.डी.ए. (राजग) गठबंधन के कन्वेनर जे.डी.यू. के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी ने सभी 403 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया है। जाहिर सी बात है कि जे.डी.यू. के लिये इस बड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में शरद यादव- नीतीश कुमार और पार्टी में उत्तर प्रदेश से जुड़े दो खास नेता राज्यसभा सदस्य आर.सी.पी. सिंह और राष्ट्रीय महासचिव के.सी.त्यागी शामिल हैं। इसमें आर.सी.पी. सिंह नीतीश के खासमखास तो हैं ही, खास बात की उत्तर प्रदेश कैडर के आई.ए.एस. अधिकारी भी रह चुके हैं। इनदिनों जब उत्तर प्रदेश चुनाव की गतिविधियाँ तेज हैं जे.डी.यू. के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, आर.सी.पी. सिंह और के.सी.त्यागी राजधानी लखनऊ में हरसंभव मौजूद रहकर इस पूरे चुनाव का निर्देशन कर रहे हैं। जे.डी.यू. भट्टा परसौल किसान आंदोलन के नेता मनवीर तेवतिया को जेवर विधानसभा से टिकट दिया है तो कई पूर्व सांसदों, विधायकों और दूसरे दलों के विक्षुब्ध निवर्त्तमान विधायकों को चुनाव में उतारा है। उत्तर प्रदेश के बहाने जे.डी.यू. अपना राजनीतिक विस्तार बिहार के बाहर करना चाह रही है और 2014 के चुनाव में अपने बढ़े दबदबे का ऐहसास राष्ट्रीय स्तर पर भी कराने की ख्वाहिशमंद है। 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा में जनता दल यूनाईटेड के 2 सदस्य थे तो 2007 के विधानसभा में 1 सदस्य मौजूद था। उधर केन्द्र सरकार में कांग्रेस की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने भी उत्तर प्रदेश के सभी विधान सभा सीटों के लिये उम्मीदवारों की सूची बना रखी है और बताया जा रहा है की तृणमूल तकरीबन 200 सीटों पर चुनाव लड़ने के मूड में है। वैसे इस तरह की चर्चा भी गरम है कि तृणमूल का जे.डी.यू. से गठबंधन हो सकता है। लेकिन जे.डी.यू. और तृणमूल दोनों की ही राष्ट्रीय पार्टी के रूप में वजूद बनाने की महत्वकांक्षा के कारण ये गठबंधन सिर्फ चर्चा के तौर पर ही जारी है। उधर बी.जे.पी. को उत्तर प्रदेश चुनाव में एन.डी.ए. के अहम सहयोगी के अलग चुनाव लड़ने पर बहुत जवाब देने की स्थिति में नजर नहीं आती है। उत्तर प्रदेश के लिये जारी विजन डॉक्यूमेंट में नीतीश कुमार की तस्वीर और बिहार के सुशासन की खास चर्चा कर बी.जे.पी. ने अपने सहयोगी के प्रति तल्खी को कमतर कर दिखाने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश में बी.जे.पी. अभियान समिति के संयोजक कलराज मिश्र कहते हैं कि "सीटों पर तालमेल के अभाव और जे.डी.यू. की महत्वकांक्षा के कारण समझौता नहीं हो पाया लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य में दोनों दल अहम सहयोगी हैं। वैसे भी जे.डी.यू. के नेता ही एन.डी.ए. के संयोजक हैं।" बी.जे.पी. अपने सहयोगी के अलग चुनाव लड़ने पर बहुत नहीं बात करना चाहती है वहीं जे.डी.यू. के नेता खुलकर बात करते हैं जिसमें पार्टी की राष्ट्रीय महत्वकांक्षा साफ झलकती है। अब ये भी देखने की बात होगी की जिन इलाकों में दोनों पार्टियाँ एक दूसरे को सीधी टक्कर दे रही होंगी, इसके नेता कैसे बचाव करते हुये प्रचार करते हैं। इस सबके बीच उत्तर प्रदेश में जे.डी.यू. के भविष्य को लेकर काफी उत्साहित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव कहते हैं कि "राष्ट्रीय स्तर पर और बिहार में एन.डी.ए.बखूबी मौजूद है पर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात में पार्टी जनता के प्रति नैतिक जिम्मेदारी लेकर मैदाने जंग में है। हमारा मकसद सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं है बल्कि विचारधारा के स्तर पर जनहित में आन्दोलन खड़ा करना है।"

बिहार में लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल मुख्य विपक्षी पार्टी है। बिहार की विधानसभा में इसका वजूद बहुत कमतर है। यही नहीं सड़कों पर भी आन्दोलन के बगैर आर.जे.डी. की नैया डगमगा रही है। फिलहाल लालूजी दिल्ली दरबार को खुश करने में लगे हैं। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी ने सांप्रदायिक ताकतों का नेस्तनाबूद करने और सेक्यूलर फोर्सेज को मजबूत करने का ऐलान किया है। पहले तो पार्टी के राष्ट्रीय संगठन को प्रतीकात्मक रूप से जिंदा रखने के लिये लगभग 10 सीटों पर लड़ने का प्लान बना रही थी लेकिन कांग्रेस की ओर से थोड़ा संकेत मिलते ही लालूजी एक सीट लेकर खुश हो गये। 2007 के विधानसभा चुनाव में आर.जे.डी. ने करीब 35 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से 2 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी वहीं करीब 8 से 10 सीटों पर तीसरे नंबर पर रहकर बेहतरीन परफॉर्मेन्स किया था। इस बार कांग्रेस ने लालू यादव के एक समधी जितेन्द्र यादव को गाजियाबाद जिले की विधानसभा सीट से चुनाव में उतारा है और इस बात के भी स्पष्ट संकेत मिलते रहे हैं कि कांग्रेस और आर.जे.डी. के बीच अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। आर.जे.डी. के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अशोक सिंह कहते हैं कि - "हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजबूत करने पर जोर देंगे और भारतीय जनता पार्टी जैसी सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों को कम से कम संख्या पर निबटाने के लिये काम करेंगे।"

बिहार की सियासी पार्टियों में उत्तर प्रदेश में सबसे हास्यास्पद स्थिति रामविलास पासवान की पार्टी लोकजनशक्ति पार्टी की है। एल.जे.पी. ने उत्तर प्रदेश में पिछली मर्तबा करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ा था पर 1 भी सीट जितने में असफल रही थे। मिडिया के हलके या फिर आम लोगों से पूछे तो उत्तर प्रदेश में इसका नामलेवा बामुश्किल से बचा है। अब सुप्रीमों ने 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। इस पार्टी का दफ्तर लखनऊ में ढ़ूढ़ना शायद संभव हो जाय पर नेता ढ़ूढ़ना बड़ा ही कठिन है। लगता तो यही है कि रामविलासजी अपने बढ़े वजूद के साथ काँग्रेस में विलय की तैयारी उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने कर रहे हैं।

एक तौर पर कहें तो स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसी बिहार के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का सभी सीटों पर चुनाव लड़ना। इस बार ये बिहार की सियासी पार्टियाँ उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में हैं। इस तीनों दलों में जे.डी.यू. कुछ ज्यादा कांफिडेन्स में नजर आ रही है और उसके कई सीट जितने की उम्मीद भी लगाई जा रही है। अगर जे.डी.यू. कुछ सीटें जीत लेती है तो त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में अपनी भूमिका तलाश सकती है, साथ ही वोटों का प्रतिशत ठीक रहने की स्थिति में भी ऱाष्ट्रीय पार्टी के तौर पर वजूद बनाये रखने में मदद मिलेगी। लेकिन जे.डी.यू. की पूरी रणनीति के पीछे 2014 के आगामी लोकसभा चुनाव के बाद की भूमिका है जिसमें पार्टी बेहतर व बड़ी भूमिका निभाना चाह रही है और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राष्ट्रीय स्तर पर भावी राजनीतिक महत्वकांक्षा का दिल्ली की ओर रास्ता भी उत्तर प्रदेश से ही हो कर जाता है। जे.डी.यू. से सीधे तौर पर बी.जे.पी. को थोड़ा घाटा होता दिखता है क्योंकि अगर ये दोनों दल साथ लड़ते तो बी.जे.पी. को भी सेक्युलर पार्टियों के मुकाबले खुद को रखने में मदद मिलती। लेकिन जब जे.डी.यू. अकेले बूते लड़ रही है तो बी.जे.पी. सहित सेक्यूलर दलों को भी उन इलाकों में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है जहाँ हार जीत का अंतर कम होगा। आर.जे.डी. कांग्रेस के समर्थन में चुनाव मैदान में नहीं है लेकिन इसका बहुत लाभ कांग्रेस को होगा ऐसा भी नहीं है। कांग्रेस ने लालू यादव के नये समधी जितेन्द्र यादव को चुनावी मैदान में उतारा है तो ये बात भी चर्चे में है कि लालू क्या कांग्रेस के पक्ष में उत्तर प्रदेश में प्रचार करेंगे। अगर ऐसा होता है तो शायद कांग्रेस को कुछ लाभ भले न मिले लेकिन राहुल के बाद लालूजी के नाम पर कुछ भीड़ जुटाने में जरूर मदद मिलेगी। राज्य के राजनीतिक हालात में आम जनता समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच सीधी पहले- दूसरे नंबर से लिये टक्कर की संभावना देख रही है ऐसे में मुलायम और अखिलेश को छोड़ जनता - खासकर यादव-अल्पसंख्यक-पिछड़ा मतदाता लालू को सुन सकते हैं पर लालू के नाम पर उत्तर प्रदेश में वोट करेंगे इस आसार दूर- दूर तक भी नहीं दिखता है। उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम जो भी हो, बिहार की सियासी पार्टियों की राष्ट्रीय राजनीति मे दशा-दिशा और भविष्य जरूर सुनिश्चित होने जा रहा है। साथ ही इस विधानसभा चुनाव का परिणाम ये भी तय करेगा की क्या जे.डी.यू. और एल.जे.पी. दोनों उत्तर प्रदेश के चुनाव में सिर्फ वोटकटवा की भूमिका में थे। तबतक लालू- रामविलास व शरद-नीतीश के हर कदम पर इन दलों के नेताओं और समर्थकों ने टकटकी लगा रखी है तो विरोधियों ने भी नजर पैनी कर रखी है।
(मैग्निफिसेन्ट न्यूज के 'जनवरी' अंक में प्रकाशित।)

Thursday, December 22, 2011

छोटे राज्यों के गठन को लेकर उभरे सवाल

!!!क्या नीतीश कुमार मगध सम्राट बनेंगे !!!

दो भाईयों के बीच संपत्ति विवाद हुआ। आपस में जमीन- जायदाद का बँटवारा कर लिया। एक ने माँ को रख लिया और दूसरे ने पिता को रख लिया। जब सब कुछ बँट गया तो एक दूधारू गाय बची। एक भाई बेचने के पक्ष में तो दूसरा रखने के पक्ष में था। फिर दोनों के बीच इतनी तनातनी थी कि अगर एक उस गाय को रख भी ले तो दूसरा मुआवजा लेकर शांत हो जाने को तैयार नहीं था। जब सभी हार गये तो दोनों बेवकूफ जिद्दी भाईयों ने उस गाय का बँटवारा अपना दिमाग लगाकर कर लिया। एक भाई गाय के पेट के उपरी भाग का मालिक बन बैठा सोचा कि गाय तो मुँह से ही खाती है और उसके गले की रस्सी हाथ में रहेगी। दूसरा भाई पेट के नीचे के भाग का मालिक बन गया सोचा की दूध निकालेंगे तो खायेंगे और कमाई भी होगी। लेकिन दोनों भाई की मति ऐसी मारी गयी थी कि सहमति और सामुहिक लाभ की भावना जैसी कोई बात उनके बीच नहीं थी। जब एक भाई गाय को खाना खिलाने की कोशिश करता तो दूसरा उसकी पूँछ पकड़ कर हड़का देता और जब दूसरा दुध निकालने की कोशिश करता तो पहला गाय के गले की रस्सी खीचने लगता। कुछ मिलाकर स्थिति ये बनी की गाय ने दूध देना बंद कर दिया और एक दिन उसकी जान चली गयी। फिर लम्बे समय तक दोनों भाई खुद को बड़ा दिखाने और एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में परेशानियों से घिरते चले गये।


ये तो एक महज कहानी भर है पर इसकी चर्चा का संदर्भ इनदिनों देश में छोटे राज्यों को लेकर चल रहे बहस से भी जुड़ा है। भारत की विडंबना ये है कि एक ही देश में जितनी विभिन्नता के तत्व मौजूद है उतना शायद ही किसी और देश में होगी। भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भाषाई, जाति- धर्म, संप्रदाय – इन सबके आधार पर लोगों का समूह, आस्था व मान्यता तय है जो बड़े वैचारिक बहस का हिस्सा है। स्पष्ट तौर पर कहे तो रियासतों में बँटे इस देश का एकीकरण भले ही हो गया लेकिन उपराष्ट्रीय भावनायें भारत में अब भी मौजूद है। कई बार ये भावनायें जब उफान मारती है तो नये राज्य की माँग जोर पकड़ने लगती है। इसका एक बड़ा संदर्भ राज्यों के भीतर कई इलाकों में मौजूद क्षेत्रीय विषमता और असंतोष से भी है। 11 साल पहले देश में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड का गठन हुआ । इस विभाजन की खास बात ये रही की इन इलाकों की क्षेत्रीय विषमता को लेकर लम्बे समय से चले आ रहे बहस और जन आंदोलन के बाद इन राज्यों का बनाने का निर्णय लिया गया। इसी तरह तेलंगाना राज्य का सपना भी अगर पूरा होता है तो ये जनआंदोलन के दबाव के कारण ही संभव दिखायी देता है।


हाल ही में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने बहुमत के बूते राज्य के बँटवारे का प्रस्ताव विधानसभा में सिर्फ 11 मिनट के भीतर पास कर दिया। ये जनता की आकांक्षा को फलीभूत करने की कम और भावी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पासा फेंकने की कवायद ज्यादा है। उत्तर प्रदेश को चार भागों में बाँटने की मायावती के इस बुलंद हौसले वाले निर्णय की तुलना लालू यादव के सत्ता में काबिज रहने के लिये बिहार बँटवारे के फैसले से की जा सकती है। झारखंड के वजूद की माँग का ऐतिहासिक संदर्भ में महत्व व जरूरत के बावजूद लालू यादव ने कभी भी इसे तवज्जो नहीं दी, खासकर जबतक वे मजबूत बने रहे। लेकिन जैसे ही उनका सामाजिक समीकरण कमजोर पड़ता दिखाई पड़ा, अपनी लाश पर झारखंड बनने की दुहाई देने वाले लालूजी ने पलभर में सहमति दे डाली। भले ही राज्यों का वजूद में आना किसी दल के लिये राजनीतिक पासा हो सकता है लेकिन राज्य के गठन- पुनर्गठन का सवाल क्षेत्रीय- भाषाई- सांस्कृतिक अस्मिता से भी जुड़ा है।


छोटे राज्यों के समर्थन में एक बड़ी दलील क्षेत्रीय आर्थिक विषमता को लेकर है तो दूसरा प्रशासनिक नियंत्रण और शासन के सफल संचालन को लेकर भी है। इन दलीलों पर 11 वर्ष पहले नक्शे पर उभरे राज्यों झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल का आंकलन करें तो थोड़ी खुशी और बहुत सारे गम जैसे भावना मन में उभरती है। उत्तरांचल ने पर्यटन, बिजली तथा अन्य क्षेत्रों में प्रगति की है जो यहां की पुरानी ऐतिहासिक व भौगोलिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा है। वहीं छत्तीसगढ़ और झारखंड नक्सल गतिविधियों के कारण हाल के वर्षों में ज्यादा चर्चित हुआ। छत्तीसगढ़ में कुछ प्रगति की बेहतरीन कोशिशें हुई है लेकिन झारखंड की वर्त्तमान त्रासदी अफसोस पैदा करती है। इसके कुल 24 जिलों में से कहीं कम-कहीं ज्यादा 22 जिले नक्सल प्रभावित है। इसकी आर्थिक राजधानी जमशेदपुर की विडंबना देखिये तो स्टील सिटी के 5 किलोमीटर के रेडियस में किसी भी ओर जायें तो आमलोगों के चेहरे पर गरीबी का आलम देखा और महसूस किया जा सकता है। छोटानागपुर और संथाल परगना के इलाके में टीनेन्सी एक्ट की धज्जियाँ उड़ाने के कई उदाहरण सामने आ रहे हैं। बड़ी कंपनियों के लिये जमीन का अधिग्रहण हो रहा है जिसमें जनता की आर्थिक भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा की जरूरतों को ताक पर रख दिया गया। राजनीतिक उथल-पुथल और प्रशासनिक विफलता ने इस छोटे से राज्य के भीतर क्षेत्रीय असंतोष पैदा कर दिया है और यहाँ से भी नये राज्य की माँग की सुगबुगाहट होने लगी है।


बिहार की बात करें तो यहाँ मिथिलांचल, मगध, अंगप्रदेश व भोजपुर राज्य की माँग यदा- कदा होती रही है। उत्तर प्रदेश को चार भागों- पूर्वांचल, अवध प्रदेश, बुन्देलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश या हरित प्रदेश में विभाजित किये जाने पर राजनीतिक बवाल शुरू है। इधर नीतीश कुमार भी छोटे राज्यों की वकालत कर चुके हैं लेकिन उनकी ये माँग भी गौर करने लायक है कि इन छोटे राज्यों की राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुये किसी भी राज्य की विधानसभा में कम से कम 100 सीटों सुनिश्चित किया जाये। उड़ीसा, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में भी असंतोष की सुगबुगाहट होने लगी है जो खबरों की सुर्खियों से बाहर है। पश्चिम बंगाल में चौबीस परगना, उड़ीसा के तेलुगु भाषी इलाके, महाराष्ट्र में विदर्भ ये सारे इलाके राजनीतिक असंतोष जाहिर कर रहे हैं। वैसे राज्य विभाजन को लेकर सबसे सुलगता सवाल तेलंगाना की माँग तो केन्द्र के लिये एक चुनौती से कम नहीं है। इसी बीच छोटे राज्यों में भ्रष्टाचार का उदाहरण देखना हो तो उत्तर-पूर्व राज्यों को देखा जा सकता है। एक और दो सासंदो वाले राज्य होने के बावजूद वहाँ नगा, कुकी और अन्य जातीय गुटों के बीच मतभेद और संघर्ष की खबरे हकीकत बताने के लिये काफी है। यहाँ तक की जम्मू और कश्मीर को तीन भागों – लद्दाख, जम्मू और कश्मीर घाटी – में विभाजन के लिये राजनीतिक सवाल वहाँ के नेता उठा चुके हैं।


अब राज्य बने नहीं की हकीकत में न सही राजनीतिक लतीफेबाजी में मुख्यमंत्री भी बनाये जाने लगे हैं। हुआ यूँ कि एक सज्जन ट्रेन में बैठे बात कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद चार नये बने राज्यों – अवध प्रदेश, पूर्वांचल, बुंदेलखंड व पश्चिम उत्तर प्रदेश की सत्ता क्रमश: मुलायम सिंह, अमर सिंह, मायावती व अजीत सिंह को मिल जायगी । तो वहीं बैठे एक बिहारी बन्धु ने कहा कि अच्छा है बिहार को भी चार भाग में बाँट दिया जाय तो लालू यादव, रामविलास पासवान, जगन्नाथ मिश्र भी मुख्यमंत्री बन जायेंगे और नीतीश कुमार मगध के सम्राट हो जायेंगे। वहीं बैठे एक कांग्रेसी सज्जन ने तुनकते हुये विरोध किया कि वाह भाई वाह। उत्तर प्रदेश- बिहार को बाँटकर 8 मुख्यमंत्री बने और हमारे हाथ कुछ भी नहीं। सब आपही लोग ले लेंगे तो कांग्रेस क्या बजायेगी झुनझुना।


लतीफेबाजी और राजनीति की लिफाफेबाजी के बीच छोटे राज्यों का मुद्दा एक गंभीर सवाल है जो किसी एक क्षेत्र का नहीं बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा मसला है जिसपर विचार और बहस अविलंब जरूरी है।। सवाल आम जनता के लिये क्षेत्र, भाषा, संस्कृति की अस्मिता का है या फिर आर्थिक विषमता से उपजे असंतोष का है। इन्ही के बीच नेताओं के अपने स्वार्थ में राजनीतिक गोटी फिट करने का भी है। लेकिन एक बड़ा सवाल भारत के अपने एक संगठित राष्ट्र के रूप वजूद का भी है क्योंकि देश सिर्फ सरहद से नहीं इसमें रहने वाली आवाम के जज़्बे, जोश और भावनाओं से बनता है। राज्य विभाजन के लिये वैसे कमीशन पहले भी बने लेकिन देशभर से अलग राज्य की उठती माँग को देखते हुये और जनभावनाओं का ख्याल रखते हुये नये राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना एक बड़ी तात्कालिक जरूरत बन चुकी है।

('मैग्निफिसेन्ट न्यूज' के दिसंबर अंक में प्रकाशित।)

नीतीश सरकार के छह साल और सुशासन के नये जुमले की तलाश

बिहार विकास के मार्ग पर अग्रसर है - आज की तारीख में ये बात बिहार के संदर्भ में सच जरूर मालूम पड़ती है, अगर लालू यादव के दौर की तुलना में कोई बयान जारी करना हो। जाहिर है कि सुशासन, विकास और भ्रष्टाचार को लेकर हर साल पेश किया जाने वाले आकड़ों की बदौलत राज्य सरकार के हौसले बुलंद नजर आते हैं। सुशासन का जुमला तो पिछले छह सालों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जुबान से फिसल कर मिडिया के सहारे अब लोगों की जुबान पर चढ़ चुका है।


कानून- व्यवस्था के फ्रंट पर नीतीश सरकार ने जनता का वाकई दिल जीता है और लोगों में व्याप्त भय का वातावरण कम है। लेकिन सरकारी आकड़ों में बढ़ता अपराध भविष्य के लिये कई चिंता पैदा करता है। दलित उत्पीड़न और पुलिसिया जुल्म की कई घटनायें खबरों की सुर्खिया बन चुकी हैं तो हत्या, अपहरण, फिरौती और बलात्कार की कई घटनाओं ने जनमानस को झकझोरा है। नये संवेदनशील डी.जी.पी. अभयानंद की छवि और मेहनत को लेकर बेहतर उम्मीद सभी को है।


सड़क को लेकर राज्य सरकार ने काम बेहतर किया है तो बिजली के क्षेत्र में वर्त्तमान की चिंता बनी हुई है। वैसे भविष्य के लिये बहुत थोड़ी सी उम्मीद बँधती दिखाई देती है। बियाडा जमीन विवाद ने राज्य सरकार की औद्योगिकरण नीति पर सवाल खड़ा किया है और निवेश का जमीनी धरातल पर उतरना बहुत संभव नहीं हो पाया है। पलायन को लेकर सरकार के दावे में या फिर आकड़ों में बहुत दम नहीं दिखाई देता है। दशहरा, दिवाली और छठ के अवसर पर देशभर में बिहारियों के पलायन और विस्थापन की त्रासदी का सहज अनुभव किया जा सकता है।


शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नये संस्थानों का खुलना बेहतर संकेत है लेकिन पुराने प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय कॉलेज, शोध संस्थान ध्वस्त पड़े हैं। राज्य के सभी विश्वविद्यालय- कॉलेज में 50 फिसदी शिक्षकों की कमी है तो सरकार इस टोटे को रेशनलाईजेशन प्रक्रिया की खानापुर्ति से निपटना चाह रही है। शिक्षकों के वेतन, पेंशन, प्रोमोशन के मामले के बीच छठे वेतनमान को लेकर तमाम विसंगतियों से शिक्षक जुझते नजर आते हैं। वहीं यू.जी.सी. के निर्देशानुसार उम्रसीमा 65 किये जाने के लेकर सरकार गेंद कोर्ट के मामले या फिर राजभवन पर की ओर उछाल देती है। एकेडमिक सेशन के नाम पर सिर्फ परीक्षाएं सही समय पर लेने की खानापूर्ति की जाती है जबकि पढ़ाई के मामले में राज्यभर के विश्वविद्यालयों में कमोबेश एक ही तरह की तस्वीर नजर आती है। लिहाजा अच्छी शिक्षा के लिये राज्य के बाहर जाने वाले का सिलसिला थमता नजर नहीं आता है।


प्राथमिक, और माध्यमिक शिक्षा गुणवत्ता की मार झेल रहा है। बिहार सरकार ने हाल ही में राहत की साँस ली जब सुप्रीम कोर्ट ने 34, 540 शिक्षकों की नियुक्ति के लिये वरीयता सूची को हरी झंडी दे दी। अब शिक्षक पात्रता परीक्षा की प्रक्रिया के तहत बेहतर शिक्षकों की उम्मीद कुछ बँधती है। पूर्व में सर्टिफिकेट जमा कर नियुक्त शिक्षकों की परीक्षा लेकर सरकार ने पात्रता सुनिश्चित कर दी है। अब उनकी ट्रेनिंग की व्यवस्था कर दी जायगी। लेकिन इन शिक्षकों में अधिकांश के ज्ञान और विद्वता की मार बिहार के सरकारी स्कुलों के बच्चे आने वाले दशकों तक भुगतेंगे। वैसे इस मामले में भी संभावनाओं की सरकारी तस्वीर सिर्फ कागजी सुकून भर देती है।


स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार के प्राथमिक केन्द्रो में जान फूँकने की बेहतरीन कवायद हुई है। अस्पतालों में कुछ दवायें जो मुफ्त में मिलनी शुरू हुई थी उसपर ग्रहण भी लगता दिख रहा है, इसकी बानगी पी.एम.सी.एच. में भी देखी जा सकती है। पटना के एम्स का इंतजार सबको है तो आई.जी.आई.एम.एस. को उत्कृष्ट बनाने की कवायद में भी वक्त लग रहा है। इमरजेन्सी में आज भी मरीजों को बिहार के दुसरे कोने से पटना भेजने की परंपरा जारी है। स्पष्ट है की प्राथमिक केन्द्रों को छोड़ दें तो पटना के बाहर उत्कृष्ट स्तर की सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ सुविधाओं की कमी से लोगों की मौत का सिलसिला जारी है।


केन्द्र सरकार और विपक्ष के निशाने पर ग्रामीण विकास विभाग की योजनाये – मनरेगा, इंदिरा आवास रही हैं। युवा मंत्री नीतीश मिश्र की तरफ के कई बेहतर प्रयास किये गये है ताकि अनियमितताओं को रोका जा सके। सफलता भी मिली है लेकिन नीचले स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के घुन ने आम जनता को तबाह कर रखा है। इसी तरह का कुछ प्रयास खाद्यान्न व उपभोक्ता विभाग में किया गया है। गैस की बुंकिग और कालाबाजारी पर कुछ हद तक अंकुश लगा है, जनवितरण व्यवस्था में जी.पी.एस. जैसे तकनीकों के इस्तेमाल कर बेहतर बनाने की कोशिश जारी है। कृषि योजनाओं और तकनीकों को लेकर जनता के बीच सरकार ने जागरूकता बढ़ाने का काम बखूबी किया है। लेकिन बाढ़ और सुखाड़ झेलने को त्रस्त जनता उत्पादन और लागत के बीच के अंतर को मुनाफे में तब्दील नहीं कर पा रही है।


राजधानी पटना में मिडिया की तमाम सुर्खिया बटोर रही सरकार से महज से लगभग 10- 15 किलोमीटर दूर मनेर प्रखंड में आम जनता सरकार की उपलब्धियों के लिये पूरे नंबर देने को तैयार नहीं दिखी। लोग कई मामलों में नीतीश कुमार की व्यक्तिगत प्रशंसा भले करते हों लेकिन उनके सरकार के प्रशासनिक पदाधिकारियों के प्रति अच्छी राय नहीं है। आम जनता मानती है राजधानी पटना और कुछ जिला केन्द्रों को छोड़ दें तो अनुमंडल, प्रखंड, अंचल कार्यालय भ्रष्टाचार के मामले में चारागाह बन चुके हैं। बिजली संकट के दौर में डीजल कुपन किसानों तक पहुँचती इससे पहले प्रखंड कार्यालय से ही गायब हो गयी। खाद, बीज वितरण में सरकारी प्रयोग के बावजूद किसान संतुष्ट नहीं दिखते हैं। हाल ही में आये बाढ़ में सरकारी कागजों में अनेक नाव चलते रहे और राहत भी बँटे पर हकीकत में पिड़ितों तक नहीं पहुँचे। आम जनता की प्रखंड कार्यालयों और थानों के बारे में राय सिर्फ अफसोसजनक है। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य के मुखिया के तमाम वादे और नेक इरादे जिसकी गूँज जनता के कानों तक पहुँच रही है, अधिकारियों के कानों में उसकी जूं भी नहीं रेंगती।


मनेर से आगे बढ़े तो बिहटा प्रखंड का इलाका है जो पटना राजधानी से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यहाँ राज्य सरकार ने तकरीबन 2200 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है। इन्ही जमीनों पर आई.आई.टी. के अलावा कई दूसरे शिक्षण संस्थान और उद्योग खुलने हैं। स्थानीय किसानों से बातचीत करने पर पता चलता है कि अधिग्रहण में कई तरह की अनियमिततायें सामने आ रही हैं। जमीन के मुआवजे की राशि में अंतर है तो कई लोगों की जमीन का बड़ा भूखंड अधिग्रहित कर कुछ डिसमिल जमीन बाहर कर दिया गया है। इन जमीनों पर आश्रितों की सूची स्पष्ट तौर पर सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है और न ही अधिग्रहण कानून के मुताबिक इन लोगों का राहत राशि और सहायता दी गई है। तात्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद के उद्घाटित राजेन्द्र गौशाला की करीब 70 एकड़ जमीन एच.पी.सी.एल. को दी गई है, लेकिन इस जमीन पर करीब 50 सालों से खेती कर जीवन- यापन कर रहे 40 से अधिक परिवारों को विस्थापित कर दिया गया है। यही हाल बिहटा चीनी मिल का है जिसे फिर से स्थापित करने की कोशिश के बजाय दूसरे कारखानों के लिये परिसर मुहैया कराया जा रहा है। जबकि इस चीनी मिल के विस्थापितों को नये खुले कारखाने में समायोजन की नीति स्पष्ट नहीं की गई है। इन्ही इलाकों में करीब 7-8 कारखाने खुले है जिनमें स्थानीय भूमि विस्थापितों की स्थायी नौकरी की गारंटी नहीं है। वर्त्तमान में ये सारे आकड़ों के लिहाज से सुखद एहसास दे रहे हों लेकिन भविष्य में इन इलाकों में उत्पन्न होने वाली आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का कारक बनने जा रही है। इन उदाहरणों से लगता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था को कायापलट करने और औद्योगिकरण की नीति में स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था में भागीदारी की गारंटी नहीं है।


हाल ही में आये नये आँकड़े के अनुसार राज्य में विकास दर की रफ्तार 14 फीसदी है वहीं दूसरी हकीकत ये भी है कि कृषि का विकास दर ऋणात्मक में है जिसपर राज्य की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी आश्रित है। इस बार सी.ए.जी. रिपोर्ट में उजागर की गयी खामियाँ अब सरकार और जनता के जेहन से विस्मृत हो चुकी हैं लेकिन हर विभाग में सरकारी योजनाओं में अनियमितता का खुलासा प्रशासनिक कार्यशैली की विफलता की ओर इंगित करता है।


सरकार के दावे, उनकी हकीकत, आरोप- प्रत्यारोप की राजनीति के बीच विपक्ष की उपस्थिति बिहार विधान सभा में कमतर तो है ही, सड़कों पर भी इनकी मौजूदगी अवसर और परिस्थितियों की मोहताज हो चुकी है। राम विलास पासवान औऱ लालू प्रसाद यादव पटना में जनता के बीच सक्रीय होने के बजाय दिल्ली दरबार को खुश करने में ज्यादा मशगूल है। जाहिर है की एल.जे.पी. और आर.जे.डी. ने नेताओं और समर्थकों की मायूसी समझी जा सकती है। कुंद धार विपक्ष के कारण एक ध्रुवीय सी लग रही राज्य में राजनीति का पलड़ा नीतीश कुमार की ओर ही झुका हुआ है। ये एक बड़ा कारण है कि वर्त्तमान में बिहार की राजनीति का तथ्यपरक विश्लेषण यानि वैल्यू जज़मेंट संभव नहीं दिखता है।


बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के कालाधन विदेश से वापस लाने और जनलोकपाल कानून लागू करने के अभियान के दौर में बिहार सरकार ने भी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान छेड़ रखा है। सेवा का कानून लागू होने के बाद जनसुविधाओं में बेहतरी की गुंजाईश की जा रही है। सरकार की जीरो टोलेरेन्स नीति के बावजूद नीचले स्तर पर फैले भ्रष्टाचार की चर्चा जो आम जनता के बीच है शायद नीतीश कुमार जी के कानों तक भी पहुँच रही होगी। इन तमाम चर्चाओं के बीच बिहार सरकार अपनी दूसरी पारी का एक साल पूरा करने जा रही है। 24 नवम्बर को नीतीश सरकार की दूसरी पारी का एक साल पूरा होने के काफी पहले से ही सभी मंत्रालयों और सरकारी महकमों में उपलब्धियाँ जुटाने और गिनाने की होड़ लगी हुई है जो जनता के सामने पेश किया जायगा। कोई शक नहीं की एक साल की उपलब्धियाँ जब जनता के सामने रंगीन कलेवर में पेश होंगे तो सरकार के हौसले कुछ ज्यादा बुलंद हो चुके होंगे और संभव है विपक्ष कुछ और हाशिये पर जाता दिखेगा।


किसी ने भी अगर गौर किया हो तो नीतीश सरकार के पहले कार्यकाल में शासन की विफलता का ठीकरा लालू यादव और उनकी सरकार पर फूटता रहा तो इस दूसरे कार्यकाल के शुरू होते ही निशाना केन्द्र सरकार बनी। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सेवा यात्रा पर राज्यभर के दौरे पर निकले हैं। तय है कि जब ये दौरा पूरा होगा तो सुशासन का नया जुमला गढ़ा जा चुका होगा। राजनीति की मजबूरी है कि एक जुमले से ज्यादा दिन तक काम नहीं चलाया जा सकता, जाहिर है कि नये नारे और प्रतीकों की तलाश बिहार सरकार को होने लगी है।

('मैग्निफिसेन्ट न्यूज' के नवंबर अंक में प्रकाशित )

Wednesday, September 28, 2011

वो दिमाग जो खुशामदी नहीं है, सरकारों के लिए खतरा है!


विचार को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान और व्यक्ति के बीच संघर्ष की अपनी ही गाथा है, जो पौराणिक काल से चली आ रही है। जाहिर है कि एक बड़ी क्रांति की नींव विचार की बदौलत ही संभव है। प्राचीन भारतीय कालखंड में मिथकों की परंपरा की बात करें, तो रामायण के संदर्भ में रावण और महाभारत काल में कौरवों की सत्ता के खिलाफ राम और कृष्ण को एक विचार मान सकते हैं। नंद वंश के सत्ता काल में चाणक्य एक विचार बन कर उभरे। भगवान महावीर और भगवान बुद्ध भी विचार संस्कृति के आदर्श बने, जिसे तत्कालीन राजशाही ने गौर के काबिल भले ही न समझा हो लेकिन वे आज भी प्रासंगिक हैं। गैलीलियो और अरस्तु अपने वक्त में इन्हीं सत्ता प्रतिष्ठान की साजिश के शिकार हुए थे। स्पेन के लोककवि लोर्का ने बुलफाइटर का शोकगीत क्या लिखा, मौत के घाट उतार दिये गये। पंजाब के मशहूर कवि पाश को भले ही मार दिया गया, पर उनकी कविता की ये पंक्ति वैचारिक मौजूदगी का एहसास कराने के लिए काफी है…

सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना

सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।

वो राजशाही का दौर था या फिर बर्बर सभ्यताओं का काल, जब सत्ता से अलग विचार बनाने का परिणाम मौत हुआ करती थी। लेकिन लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही संवाद और विवाद को वैचारिकता का स्वाभाविक परिणाम समझा जाने लगा। अंग्रेजों ने भले ही भारत पर शासन किया हो, कई ऐसे उदाहरण हैं, जब वैचारिक विरोध को सहजता से स्वीकार किया है। हिंदी के प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर अंग्रेजों की सरकार में रजिस्ट्रार दफ्तर में नौकरी करते थे, पर सरकार की मुखालफत का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। दिनकर जी अंग्रेजों के मुखर विरोधी के रूप में लोकप्रियता के बावजूद नौकरी से न तो निलंबित किये गये और न ही बर्खास्त। आजादी के बाद दिनकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कई नीतियों के तल्‍ख आलोचक रहे। लेकिन बावजूद इसके नेहरू काल में दो बार कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य बने। कहां नेहरू ने बदला लिया। 70 के दशक में इमरजेंसी के दौर में लिखने-बोलने वालों को जेल में डालने की हिमाकत इंदिरा गांधी ने की। इस एंटी इमरजेंसी मूवमेंट के मुखर आंदोलनकारी जो आज के बड़े नेता हैं, वैचारिक विरोध पर अपने दल के नेताओं को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने में गुरेज नहीं करते हैं। ये राजनीतिक संस्कृति लोकतंत्र के लिए निश्चित तौर पर बाधक है।

इतनी बड़ी भूमिका के बाद अब असली चर्चा पर आते हैं। इक्कीसवीं शताब्दी के सूचना क्रांति के दौर में विचार का दायरा भले ही काफी बढ़ गया हो लोकतंत्र में लिखने-पढ़ने वालों पर अंकुश लगाने की खतरनाक प्रवृत्ति अब भी कायम है। ये बात ग्लोबलाइज्ड ऑनलाइन वर्ल्ड में खास हैरानी का कारण बन जाता है, जब खबर दुनिया के प्राचीनतम गणतंत्र कहे जाने वाले राज्य बिहार से हो।

बिहार विधान परिषद में सहायक के पद पर काम करने वाले दो कर्मियों – मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण को फेसबुक पर लिखने के कारण नौकरी से निलंबित कर दिया गया। मुसाफिर ने विभाग से अपने भविष्य निधि खाते की जानकारी मांगी थी, जो सात सालों से अपडेट नहीं था। इसके लिए अधिकारी उन्‍हें ही फटकार लगा रहे थे जबकि ये जिम्मेदारी विभाग की थी। इसी परेशानी में मुसाफिर ने परिषद में कई लोगों के द्वारा नियमों की धज्जियां उड़ाने का हवाला देते हुए ‘दीपक तले अंधेरा’ टिप्पणी की थी। इसी को आधार बना कर निलंबन का नोटिस थमा दिया गया। वहीं अरुण नारायण को मिले निलंबन पत्र में कहा गया है कि ‘प्रेम कुमार मणि की विधान परिषद सदस्यता समाप्त करने के संबंध में सरकार एवं सभापति के विरुद्ध असंवैधानिक टिप्पणी देने के कारण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।’ अपने कारण निलंबित साहित्यकार मित्र अरुण नारायण को मणि निर्दोष मानते हैं। कहते हैं कि “अरुण नारायण और साथ ही मुसाफिर बैठा का निलंबन शर्मनाक और अलोकतांत्रिक है। मै इसकी निंदा करता हूं और सेवा में फिर से वापस लेने की मांग करता हूं। उन्‍होंने फेसबुक पर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया है, जो निजी मित्र संवाद के दायरे में आता है। इसके लिए उन्हें दंडित करना तानाशाही का परिचायक है।” फिलहाल फेसबुक पर अभिव्यक्ति को लेकर नौकरी से निलंबन का देश में ये एक अनूठा मामला बन चुका है।

इन दोनो निलंबित सहायकों की पृष्ठभूमि देखें, तो कई समानताएं हैं, जो इस घटना के तीन-चार महीने पहले निलंबित सैयद जावेद हसन से भी जोड़ती है। विधान परिषद में उर्दू रिपोर्टर के पद पर कार्यरत जावेद ‘ये पल’ नामक छोटी सी पत्रिका निकालते रहे हैं। इसके अलावा एक उपन्यास और कहानी संग्रह (दोआतशा) लिखकर मशहूर हैं। मुसाफिर बैठा ने हाल ही में एक कविता संग्रह ‘बीमार मानस का गेह’ प्रकाशित किया है और ‘हिंदी की दलित कहानी’ पर पीएचडी की है। तो अरुण बिहार की पत्रकारिता पर शोध के अलावा पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के कारण साहित्यकर्मी के रूप में जाने जाते हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रो जाबिर हुसैन जब विधान परिषद के सभापति थे, तो 1999 में हिंदी और उर्दू के तकरीबन 25 ऐसे साहित्यकारों को परिषद में नियुक्त किया जिनके नाम न सिर्फ पीएचडी की डिग्रियां थीं, बल्कि प्रकाशित पुस्तकें भी थीं।

विधान परिषद से इन तीन कर्मियों के निलंबन की कार्रवाई तो महज एक बानगी है। हकीकत ये है कि नीतीश सरकार के आने के बाद विधान परिषद से उन सभी नियुक्त लोगों के सफाये का अभियान शुरू हुआ, जिन्‍हें पूर्व सभापति प्रो जाबिर हुसैन ने नौकरी दी थी। तकरीबन 70 से अधिक लोग पिछले 6 साल में नौकरी से हाथ धो चुके हैं। इनमें आश्चर्यजनक रूप से बड़ी संख्या दलित-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों की है। ये भी संयोग ही है कि निलंबित किये गये मुसाफिर, अरुण और जावेद क्रमश: दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। सरकार की इस मंशा के पीछे सवाल कई हैं, जिसका जवाब अंदरखाने में मिलता है। जाबिर साहब ने सभापति बनते ही विधान परिषद के अधिकारियों की समिति बनाकर वहां की नियुक्तियों का अध्ययन करवाया तो पता चला कि 90 फीसदी से ज्यादा पदों पर सवर्ण समुदाय के लोग हैं और संविधान प्रदत्त आरक्षण कानून की जमकर धज्जियां उड़ायी गयी हैं। जाबिर हुसैन ने जब नियुक्तियां की, तो उस वक्त तक के दलित-पिछड़ों के सारे बैक-लॉग भर दिये। आंकड़े बताते हैं कि 1999 में विधान परिषद में जितने लोगों को नौकरी मिली, उनमें 70 दलित, 14 आदिवासी, 56 अति-पिछड़ा और 56 पिछड़ा वर्ग से थे। जाबिर हुसैन बताते हैं कि – “1995 में सभापति बनने के पहले तक विधान परिषद में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। ये आश्चर्य की ही बात थी कि जो संस्था एक संवैधानिक कानून बनाती है, वहीं पर इसका अनुपालन नहीं हो रहा था। मेरे द्वारा की गयी सभी नियुक्तियां पारदर्शी और संविधानसम्मत है, जिसे हमने प्रकाशित कर सार्वजनिक भी किया।”

विधान परिषद में नौकरी दिये जाने का इतिहास देखें तो जब जिसकी सरकार रही और जो भी सभापति रहे, उन्होंने अपने लोगों को कौड़ी के भाव नौकरियां बांटकर उपकृत किया। कई बार इन नियुक्तियों पर सवाल भी उठे, विवाद हुआ। मामला विधान परिषद के विशेषाधिकार से जुड़ा होने के कारण सभी सवाल और विवाद ठंडे बस्ते में चले गये। लेकिन इस बार मामले ने तूल पकड़ लिया क्योंकि निलंबन का आधार फेसबुक पर की गयी टिप्पणी को बनाया गया है। पटना से लेकर दिल्ली तक के हर बुद्धिजीवी सुशासन सरकार की इस कार्रवाई से हतप्रभ है। बिहार के जाने-माने साहित्यकार हृषिकेश सुलभ लिखते हैं कि – “यह इस सरकार का शर्मनाक चेहरा है। यह सरकार भी जगन्नाथ मिश्र या लालू प्रसाद की सरकार की तरह ही हिंसक है। यह घटना इस बात को प्रमाणित करती है कि – वो दिमाग जो खुशामद आदतन नहीं करता – सरकारों के लिए खतरा होता है … मुसाफिर और अरुण नारायण हमारे समय के जरूरी युवा रचनात्मक प्रतिभा हैं। हम आपके निलम्बन की निंदा करते हैं।”

बिहार में फेसबुक पर लिखने के कारण नौकरी से निलंबन की इस घटना को हल्के से कोई भले ही ले लेकिन 21वीं शताब्दी के सूचना क्रांति दौर में हुई ये घटना परम आश्चर्य का विषय है। विचार-अभिव्यक्ति पर खतरे से जुड़ी इस पूरी परिस्थिति के निर्माण में मीडिया भी कम दोषी नहीं है। ये सिर्फ ग्लोबलाईजेशन के दौर का मीडिया चरित्र नहीं है, ये मंडल के उत्तरोत्तर काल का मीडिया चरित्र है जो साफ परिलक्षित होता है – इसके वर्गीय और जातिगत संदर्भ भी नजर आते हैं। दिलचस्प ये है कि मीडिया के गढ़े गये शब्द खास तबके को संतुष्ट करने के लिए ज्यादा गढ़े जाते रहे, जो लोकतंत्र में विचार संस्कृति के खिलाफ है। ये प्रतीक शब्द किस तरह से सरकारों के माथे पर चस्‍पां कर दिये जाते हैं और फिर समाज में प्रचलित किये जाते हैं, इनका भी एक विशेष समाजशास्त्रीय संदर्भ है। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी सरकार घोषित रूप से जंगल राज के रूप में कुख्यात बना दी गयी तो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू-बीजेपी सरकार को सुशासन सरकार के रूप में देश-दुनिया में विख्यात किया गया। इन सबके बीच मीडिया के पूर्वाग्रह की हद देखिए कि न तो लालू और न ही नीतीश का व्यक्तिगत तौर पर व उनकी सरकारों का निष्पक्ष, पूर्वाग्रह रहित व तथ्यपरक विश्लेषण आजतक हो पाया है। जब फेसबुक पर लिखने के कारण निलंबन जैसी घटना को अंजाम देने का दुस्साहस सुशासन दौर में कोई सत्ता प्रतिष्ठान करता है, तो इससे दक्षिणपंथी संस्कृति की बू आती है।

पहले जावेद और अब मुसाफिर व अरुण का विधान परिषद की नौकरी से निलंबन का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इसी बहाने कई अंदरूनी परतों के उघड़ने से विधान परिषद का सामाजिक चरित्र भी उजागर हो रहा है। जन सरोकार और जनहित से जुड़े मुद्दों के हाशिये पर चले जाने के खतरे के बीच, समर्थन-विरोध व आरोप-प्रत्यारोप से निकलते सवाल चिंता पैदा करते हैं। क्या विचार संस्कृति सुशासन में बाधक है या फिर सुशासन सुनिश्चित करने के लिए विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बलि दे दी जाएगी। जवाब सबके पास होना जरूरी है क्योंकि “जो तटस्‍थ रहेगा उसका भी दोष लिखेगा इतिहास।”

Thursday, July 21, 2011

सी.ए.ज़ी. की रिपोर्ट और नीतीशजी की चिंता


बिहार के वित्तीय हालात को दर्शाने वाली रिपोर्ट में - नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानि सी.ए.जी.- ने राज्य सरकार को आर्थिक लेखा- जोखा रखने के तौर तरीकों पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एसी- डीसी बिल का जिन्न अब भी सरकार के गले की हड्डी बनी दिखाई देती है। कॉम्पट्रोलर ऐन्ड एकाउन्टेन्ट जनरल यानि सी.ए.जी. मार्च, 2010 तक खत्म होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए जो लेखा- जोखा का रिपोर्ट सौंपा है उसमें राज्य सरकार के लिए कई परेशान करने वाले तथ्य भी हैं। ये रिपोर्ट बिहार विधान मंडल के पटल पर रखा गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार मार्च, 2010 तक 407.97 करोड़ रूपये से जुड़े 1021 मामले अभी तक निपटारे के लिए लंबित है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च, 2009 तक 58423 एसी बिल पर 14272 करोड़ रूपये की निकासी हुई परन्तु 2418 करोड़ रूपये के लिए 7435 डीसी बिल ही महालेखाकार को दिये गये। आश्चर्य की बात ये की राज्य सरकार के पारदर्शिता के दावे के बावजूद अक्टूबर, 2007 तक विभिन्न विभागों द्वारा दिये गये 4528 करोड़ रूपये के ऋण अनुदान संबंधी 21147 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित थे। हालांकि सी.ए.जी. ने राज्य सरकार को राज्य के रिसोर्स से रेवेन्यू खर्च और रेवेन्यू जुटाने के प्रयास की प्रशंसा की है। वहीं सी.ए.जी. ने वेतन, पेंशन और ब्याज अदायगी में कुल बढ़ोत्तरी 55.77 प्रतिशत होने पर खिंचाई भी की है। सी.ए.जी. का कहना है कि 12 वित्त आयोग के निर्देशों के अनुसार गैर योजना मद में कुल खर्च 35 फीसदी से ज्यादा नहीं हो ।

नीतीश कुमार के काम के जज्बे और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के बावजूद कई तरह की लापरवाही और मिलीभगत के संकेत भी सी.ए.जी. की रिपोर्ट में साफ तौर पर दिखाई देते हैं। बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री सेतु योजना के तहत 2007 से 2010 तक आवंटित 522 पुलों में से 404 का निर्माण किया। दरभंगा प्रमण्डल में बिना एकरारनामा किये काम किये जाने के कारण 12.13 करोड़ की हानी हुई। वहीं पुर्णिया के कप्तान पुल की निविदा में विलम्ब होने से 2.00 करोड़ एस्टीमेट में इजाफा हो गया। पुर्णिया के रेलवे ओवरब्रिज निर्माण में कांट्रेक्टर को 43.84 लाख अधिक पेमेंट करने और सुल्तानगंज रेलवे ओवरब्रिज कांट्रेक्टर से 0.80 लाख कम रिकवरी की बात भी सी.ए.जी. ने लापरवाही करार दिया है। वहीं लरझा घाट, समस्तीपुर, रसियारी घाट, दरभंगा में पुल निर्माण कार्य में बिना एस्टीमेंट घटाये कम क्वांटम के डिजाईन को स्वीकार किया जाने के कारण सरकार को 13.21 करोड़ का घाटा बताया गया है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड को विभिन्न मद में लगभग 11.31 करोड़ का घाटा हुआ है। इसमें टैरिफ प्रावधानों का अनुपालन न होने के कारण 5.21 करोड़ और भूमिगत केबल के अनावश्यक क्रय के कारण 3.35 करोड़ खास हैं। 2005 से 2010 के बीच राज्य में कुल सरकारी कंपनियाँ और सांविधिक निगमों की संख्या 65 हैं जिनमें 40 अकार्यशील कंपनियाँ हैं। सी.ए.जी. ने इसे बंद किये जाने की आवश्यकता जताई है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2009-10 के दौरान सिर्फ 3 अकार्यशील कंपनियों ने वेतन, मजदूरी, स्थापना व्यय में 1.48 लाख खर्च किये हैं। अफसोस की बन्द और अकार्यशील कंपनियों के कर्मचारियों और संपत्ति का सरकार कही दूसरे विभाग या मद में समायोजन का प्रयास नहीं कर रही है।

बिहार सरकार का टोटल सैनिटेशन कैन्पेन सफल नहीं हो रहा है। 2005 से 2010 के बीच सिर्फ 24 फीसदी घरों में सैनिटेशन का लक्ष्य हासिल हुआ है जो सरकार के दावे से उलट है। वहीं बिहार के सिर्फ 66 प्रतिशत स्कुलों में ट्वायलेट की व्यवस्था 2005 से 2010 के बीच हो पाई है। सैनिटेशन प्रोजेक्ट के सही ढंग से मोनिटरिंग नहीं किये जाने की बात सी.ए.जी. ने की है। सी.ए.जी. के स्कुलों की व्यवस्था पर भी चिंता जाहिर की है। कई जगहों पर 70 से 400 छात्रों के लिये एक कमरे का स्कुल है। सी.ए.जी. ने निरीक्षण के दौरान एक कमरे वाले ऐसे 139 स्कुलों को पाया। शिक्षकों की भारी कमी की ओर भी इशारा किया गया है। 1985 के पहले खुले प्रोजेक्ट बालिका विद्यालयों की जाँच के दौरान सी.ए.जी. 22 स्कुलों में गई और पाया कि एक स्कुल में 9 शिक्षक हैं तो चार स्कुल में एक भी छात्र नहीं है। आश्चर्य व्यक्त किया कि 141 से 741 छात्रों के लिये एक भी शिक्षक नहीं है। इस पर सी.ए.जी. ने टिप्पणी की है कि स्कुलों का प्रोपर इन्सपेक्शन नहीं किया जाता है। बिहार के जेलों में सुरक्षाकर्मियों, मेडिकल और टेक्निकल स्टाफ के बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। जेलों में विडियों लिंकेज सिस्टम की स्थापना के लिये आवंटित 6.23 करोड़ की राशि का उपयोग नहीं हुआ है। खास बात की 15 जेलों से जुड़े 518 कस्टडियल डेथ के मामले में 28 की मजिस्ट्रेट जाँच की रिपोर्ट एन.एच.आर.सी. को भेजी तक नहीं गई है। सी.ए.जी. ने स्पष्ट लिखा है कि बिहार के जेलों में आई.जी. और डी.एम. उपयुक्त संख्या में इन्सपेक्शन नहीं करते हैं....वहीं इस विभाग में को इंटरनल ऑडिट विंग नहीं है। जल संसाधन विभाग के मामले में सी.ए.जी. की एक टिप्पणी मजेदार है कि भारत सरकार के निर्देशों के गलत इंटरप्रेटेशन से राज्य सरकार को 1.49 करोड़ का घाटा हुआ है। ये मामला कमान्ड एरिया डेवलपमेंट और वाटर मैनेजमेंट प्रोग्राम में केन्द्र और राज्य के बीच 50-50 प्रतिशत की राशि शेयर करनी है साथ ही लाभान्वित किसानों से 10 फीसदी राशि की वसूली की बात थी। वहीं उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के वन एवं पर्यावरण विभाग पर भी गंभीर टिप्पणी है। सी.ए.जी. कहती है कि राज्य ने अभी तक अपनी कोई वन नीति जाहिर नहीं की है वहीं 22 में से 20 फॉरेस्ट डिविजन बिना किसी वर्किंग प्लान के चल रहे हैं। वहीं 2010 में सहरसा फोरेस्ट डिविजन में 13.96 लाख के फ्रॉड पेमेंट की बात भी की गई है जो बिना वृक्षारोपण के किया गया। इस तरह सी.ए.जी. की रिपोर्ट में सभी विभागों में गलत निकासी, मिलीभगत से राशि गबन करने, फर्जी काम कराने के मामले भरे परे हैं। यानि नितीश कुमार के कार्यप्रणाली और संस्कृति पर ही सी.ए.जी. ने सवाल उठा दिया है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तेवर प्रशासनिक चुस्ती को लेकर काफी सख्त है और भ्रष्टाचार के मामले पर तो बिहार सरकार ने राज्य भर में मुहिम छेड़ रखा है। पर लगता है कि मुख्यमंत्री वाकई लालफीताशाही के शिकार हो गये हैं। जिला और प्रखंड स्तर के प्रशासनिक पदाधिकारियों और कर्मचारियों में मुख्यमंत्री जी की कवायद और तेवर का असर बहुत नहीं दिखता है। इस पूरे रिपोर्ट में नीतीश सरकार के काम के जज्बे के बीच कई तरह की लापरवाही और मिलीभगत के संकेत भी साफ तौर पर दिखाई देते हैं। इससे दलालों, ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच गठजोड़ की बात भी स्पष्ट जाहिर होती है जो नीतीश सरकार के लिये बदनुमा दाग की तरह है। देखना होगा की राज्य सरकार अपने लेखा- जोखा में पारदर्शिता कैसे ला पाती है। लेकिन इस पूरे रिपोर्ट ने बिहार में विपक्ष को एक मुद्दा दे दिया है तो राज्य की जनता भी सब देख- सुन और जान रही है ऐसे में सी.ए.जी. ने जो सवाल उठाये हैं वो सिर्फ कागजी चिटठा भर नहीं है पर राज्य की आर्थिक हालात और जमीनी हकीकत का काला चिटठा भी है / जाहिर है की सी.ए.ज़ी. ने राज्य के आर्थिक हालत की एक बानगी यानि तस्वीर भर पेश की है लेकिन नीतीश कुमार के लिए ये राजनीतिक चिंता पैदा करने वाली बात है।

Sunday, January 16, 2011

मेनिफेस्टो या झूठे वादों का पुलिंदा

मेनिफेस्टो किसी भी पार्टी की नीतियों और विचारों का जनता के बीच जारी एक घोषणा पत्र है l इस लिहाज से कहें तो मेनिफेस्टो किसी भी पार्टी का एक आईना है जो जनता के बीच किसी भी पार्टी और नेता की समाज और देश के प्रति भविष्य की दृष्टि को पेश करता है l आजाद भारत में लगभग साठ साल के चुनावी अनुभव के बाद भी प्रतीकों और नारों का बोलबाला है वहीँ मुद्दे गौण अथवा संघर्ष करते नज़र आते हैं l ये कहना तब लाजमी हो जाता है जब अधिकतर दलों के मेनिफेस्टो प्रोपोगंडा ज्यादा करते और मुद्दे कम बनाते नज़र आते है l बात देश की है पर सन्दर्भ बिहार के वर्तमान विधानसभा चुनाव से है l इस सिलसिले में सभी पार्टियों के बिहार विधानसभा चुनाव 2005 के समय जारी मेनिफेस्टो को खंगालने पर पता चलता है की सत्ताधारी दल जहाँ पूरे मेनिफेस्टो में किये गए अपने वादे ही भूल गयी वहीँ ऐसा लगता है की अन्य विपक्षी पार्टियां महज़ खानापूर्ति के लिए जारी करती हैं l

पिछले पांच सालों का आंकलन करें तो विपक्षी पार्टियां जनहित के मुद्दों पर आन्दोलन करती कहीं भी नजर नहीं आई l ऐसे मौकों पर जनता खुद संघर्ष करती दिखी और थोडा बहुत उन्हें स्थानीय नेताओं का साथ मिला l जमीनी स्तर पर वस्तुस्थिति का आंकलन करें तो पता चलता है की जनता में मेनिफेस्टो को लेकर कोई बहुत जागरूकता नहीं नज़र आती है l और न ही नेता जनता के बीच मेनिफेस्टो के आधार पर वोट मांगने की कोशिश करते हैं l एक अनुमान के मुताबिक लगभग 75 फीसदी लोगों को आमतौर पर वोट देते वक़्त उक्त पार्टी के मेनिफेस्टो के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता है l वहीँ 15 फीसदी लोगों को मेनिफेस्टो के बारे में आंशिक रूप से सुना होता है या फिर जानते होते है जबकि 5 से बामुश्किल 10 % लोगो को ही मेनिफेस्टो का पता होता है जो वोट देने के वक़्त उन्हें प्रभावित करती हैं l मीडिया में किसी भी पार्टी के मेनिफेस्टो के प्रकाशन की खबर तो आती पर वो जनता के बीच खबर नहीं बन पाती l जनता में भी मेनिफेस्टो को एक रिवाज़ के तौर पर मानकर बहुत तवज्जो दिया जाय ऐसी बात नहीं है l पार्टियां भी इसे जारी करने की खानापूर्ति करती है जिसकी थोड़ी बहुत चर्चा मीडिया के माध्यम से जनता के बीच पहुंचती है l लेकिन आश्चर्य होता है जब मेनिफेस्टो जारी करने वाली इन्हीं पार्टियों के नेता चुनाव प्रचार के लिए जनता के बीच जाते है तो मेनिफेस्टो की चर्चा शायद नहीं करते है l जनता को लुभाने वाले प्रतीकों- बिम्बों और प्रोपोगंडा का सहारा लिया जाता है वोट के लिए l

समाजशास्त्री इसके लिए दोतरफा कारण मानते हैं l पहला तो लोकतंत्र के प्रति जनता में रूचि का अभाव है और ये सिर्फ वोट देने के रिवाज़ तक सीमित हो गया है l जब हम सिर्फ साक्षरता मिशन ही अभी पूरा करने में लगे हैं, ज्ञान पर आधारित समाज की परिकल्पना अभी दूर की कौरी नज़र आती है l हक- हकूक और अधिकार बोध हर जनता के सोच में शुमार हो इसके लिए शिक्षा का मजबूत बुनियाद आवश्यक है और ये बातें ही लोकतंत्र की जड़ो को गहरे तक जमा सकता है l दूसरा कारण है पार्टियों में आतंरिक लोकतंत्र का न होना इस कारण अधिकाँश बड़ी पार्टियों में जमीनी स्तर के मजबूत नेता संगठन में कम दिखाई देते है l या तो इनकी पंहुंच शीर्ष नेताओं तक नहीं हो पाती या फिर ये शीर्ष नेता इन वजूद वाले नेताओं के साथ सहज नहीं महसूस करते हैं l राष्ट्रीय दलों जैसे बी.जे.पी., कांग्रेस और वामदलों के साथ पार्टी का कैडर बेस तो दिखता है पर अधिकाँश नई और क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थक कैडर कम और भीड़तंत्र का सहज एहसास देते है l जो लोग इस तरह के दलों के प्रति समर्पित भी दिखाई देते हैं वो विचारधारा के प्रति नहीं बल्कि नेताओ के प्रति ज्यादा निष्ठांवान नज़र आते हैं l

दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कालेज में इतिहास के प्राध्यापक पी.के.चौधरी कहते है की मेनिफेस्टो एक ऐसी हिपोक्रेसी है जिसे राजनीतिक दलों को परंपरा और बौद्धिक मुखौटा के तौर पर ही सही बनाये रखना चाहिए l आमतौर पर ये पार्टियों की एक विशलिस्ट है जिसके आधार पर जनता वोट नहीं देती है और न ही जनता ये सवाल उठाती है की आपने मेनिफेस्टो में कुछ लिखा तो क्यों नहीं पूरा किया l लेकिन सैद्धांतिक रूप से इन मेनिफेस्टो का उपयोग प्रेशर ग्रुप और विपक्ष चुनाव में बेहतर कर सकती हैं l पी.के.चौधरी ये भी कहते है साक्षरता दर और मध्य वर्ग का आकार जैसे जैसे बड़ा होगा भविष्य में पार्टियों को मेनिफेस्टो के आधार पर आंकलन करने का चलन बढेगा l पर इसके लिए बुद्धिजीवियों, सामाजिक और गैर राजनीतिक संगठनो की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में बड़ी और बेहतर भूमिका निभाना होगा l

मेनिफेस्टो के आधार पर हमने एक कोशिश की बिहार के विकास को आंकने की इन दिनों बिहार में पंचायती राज व्यवस्था की सफलता की दुहाई बहुत दी जाती है पर पंचायतें प्रशासनिक भ्रष्ट्राचार की एक कड़ी के रूप में नज़र आती हैं l ग्रामसभा का आयोजन शायद ही कहीं सार्वजनिक रूप से होता है पर कागजो में जरूर अंकित होती है l मनरेगा, प्रधानमंत्री सड़क योजना, इंदिरा आवास योजना, डीजल- बीज सब्सिडी कूपन, बैंकिंग लोन व्यवस्था, जन वितरण प्रणाली व्यवस्था इन सारी योजनाओ में भ्रष्ट्राचार का घुन इस कदर घुस चुका है की जमीनी स्तर पर जनता का विक्षोभ उनके चेहरे पर जरूर नज़र आता है l उद्योग, पूंजी निवेश, कृषि, उच्च शिक्षा, सामान शिक्षा प्रणाली और भूमि सुधार का दावा यूँ ही बक्से में बंद हो गया l पर शायद ही कोई पार्टी विकास के दावे और आरोप- प्रत्यारोप के बीच जनहित के मुद्दे पर संवाद बनाने की कोशिश कर रही हो l

बिहार के एक अर्थशास्त्री प्रो.नवल किशोर चौधरी कहते है की आज के सन्दर्भ में मेनिफेस्टो एक झूठे वादे का पुलिंदा है जिसे पार्टिया सत्ता में आने के बाद भूल जाती है l बिहार के सत्ताधारी दल के मेनिफेस्टो के आधार पर विकास के दावे को तौलते हुए कहते है की सरकारी आंकड़ो के अनुसार 2009 - 2010 बिहार का विकास दर 4.72 है वहीँ कृषि और पशुपालन का विकास दर ऋणात्मक -17.62 है जिस पर बिहार की 80 % जनता निर्भर है l तेंदुलकर रिपोर्ट के अनुसार बिहार में गरीबी 55 % है और सर्वे में पलायन की जो चौथी रिपोर्ट आई है उसके अनुसार पलायन नहीं रुका है l विकास शहरी क्षेत्रों में कुछ लोगों तक सीमित दिखाई देता है l प्रो. चौधरी बिहार में चमत्कारी विकास के नीतीश कुमार के दावे की तुलना इंडिया शाइनिंग के गुब्बारे से करते है l

इन सब आंकड़ो के बावजूद विपक्षी पार्टिया इसे मुद्दा बनाने की बजाय जाति और जमात को ही भुनाती दिखती हैं l यहाँ छह पार्टियों के 2005 विधानसभा चुनाव के मेनिफेस्टो दिए गए है जो ये दर्शाते है की सत्ताधारी दलों के वादे बामुश्किल 20 से 25 % ही या तो पूरे किये गए अथवा पूरा करने की कोशिश की गयी l वहीँ अन्य विपक्षी पार्टियां मेनिफेस्टो में किये गए अपने वादे को लेकर जनता के बीच गयी नहीं और न ही जनांदोलन करती दिखी l मेनिफेस्टो का चुनाव में वोट का आधार न बन पाने का एक बड़ा कारण सामाजिक संगठनो, विद्वानों और बुद्दिजीवियों की चुनावी सक्रियता में कमी भी है l हाल के दिनों में कई गैर सरकारी संगठन नेताओं की संपत्ति, आपराधिक रिकार्ड का खुलासा जनता और मीड़िया में करने लगी है वैसे ही मेनिफेस्टो को जनता के बीच ले जाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है ताकि इस बात का खुलासा हो की पार्टियों व नेताओं के किये वादे कितने पूरे, कितने अधूरे और कितने झूठे हैं l हालाँकि इस लेख के दौरान सभी पार्टी के नेताओं से बातचीत की कोशिश में ये दावे सामने आये की उनकी मेनिफेस्टो के प्रति निष्ठा है और दुसरो के मेनिफेस्टो को झूठ का पुलिंदा भी बताने से नहीं चुके l

आई.सी.एस.एस.आर. के सदस्य रह चुके और वर्तमानं में पटना स्थित एक प्रसिद्द संस्थान 'एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीच्युट' (आद्री) के निदेशक प्रभात घोष बताते है की अच्छे मेनिफेस्टो का लाभ थोडा- बहुत पार्टियों को जरूर मिलता है लेकिन बाद में सरकार के कामों का मेनिफेस्टो के आधार पर आंकलन जनता और विपक्ष नहीं कर पाती l इसका मतलब ये नहीं की मेनिफेस्टो का कोई मतलब नहीं क्योंकि अच्छे मेनिफेस्टो का लाभ पार्टियों को मिले न मिले पर बुरे मेनिफेस्टो के लिए वे निश्चित रूप से निशाने पर होंगी l ये उसी तरह की बात है की जैसे की एक कहावत है की फुटबाल में अच्छा रेफरी वही होता है जिसकी चर्चा एक अच्छे मैच की समाप्ति के बाद नहीं होती है पर जब मैच का अंत बुरा या फिर विवाद के साथ होता है तो रेफरी की ख़ास चर्चा होती है l वे बताते हैं की ये सही बात है की मेनिफेस्टो का आम जनता के लिए कोई ख़ास मतलब नहीं बनता है लेकिन पार्टियों को जब मीडिया, बुद्धिजीविओं और विपक्ष से निपटना होता है तो ये मेनिफेस्टो ही उनके लिए सन्दर्भ का आधार बनती है l

आजादी के बाद से ही देश में दिनों-दिन राजनीति का जो तकाजा दिखता है उसमें गिरावट ही नजर आती है l बात सिर्फ मूल्यों और नैतिकता की नहीं है संवाद बनाने की कोशिश बड़े तौर पर नहीं दिखती है l पार्टियां भी मीडिया का सहारा इतना ज्यादा लेने लगी हैं जनता से अपने सरोकारों को जोड़ने में की सीधे संवाद की गुंजाइश कम नज़र आती है l मीडिया के अपने उसूल और कारण हैं जो टी.आर.पी. या यूँ कहें की बाजार निर्देशित ज्यादा है l ये बात इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर ज्यादा लागू होती है प्रिंट की बजाय l कई महत्वपूर्ण जनहित के सरोकारों का मीडिया में खबर न बन पाना लोकतंत्र की जड़ो को नीचे ले जाने में बाधक है l एक महत्वपूर्ण सवाल मेनिफेस्टो रिलीज़ करने वाली उन पार्टियों से भी है की क्या कारण है की विधानसभाओं व संसद में संवाद और बहस का समय और स्तर गिरता जा रहा है l

लोकतंत्र लोगो के उम्मीद पर कायम है पर बेहतर हो की ये जनता के जीवन और विचारों को प्रभावित करे l जनता जिस दिन पार्टियों को उनके मेनिफेस्टो में किये गए वादे और सत्ता में आने के बाद किये गए कायों के आधार पर जनमत बनाना शुरू कर देंगी नेताओ को झूठे वादे और ढकोंसलों का की कीमत पर का अंदाजा लगेगा l फिलहाल ये बातें दूर का ढोल सुहावना लगने जैसी हो पर वो दिन दूर नहीं जब नेताओ और पार्टियों का ये बौद्धिक आवरण जनता के बीच मतदान के दिन तराजू का काम करेगा ।
(नोट- चित्र http://www.johnehrenfeld.com से साभार।)